संजय गांधी की पुण्यतिथि पर जानिए आपातकाल से लेकर शादी और फिर दुखद दुर्घटना की कहानी

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29 जुलाई 1974 को, प्रधान मंत्री निवास से एक छोटी सी घोषणा की गई थी। यह प्रधानमंत्री के छोटे बेटे की सगाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी की मेनका आनंद के साथ सगाई हुई थी। सगाई 01, सफदरजंग रोड में एक छोटे समारोह में हुई। जैसे ही यह खबर फैली, पूरा देश यह जानने के लिए उत्सुक हो गया कि प्रधानमंत्री का छोटा बेटा किससे शादी कर रहा है, वह लड़की कौन है।

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प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, “मेनका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जर्मन भाषा की छात्रा हैं और साप्ताहिक पत्रिका दिल्ली डेटलाइन में पत्रकार हैं।” वैसे, मेनका ने इससे पहले ही सुर्खियां बटोरी थीं। 1973 में वह दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में मिस लेडी बनीं। इस प्रतिभावान छात्रा के लिए मॉडलिंग के प्रस्ताव आने लगे।

विनोद मेहता ने अपनी पुस्तक ‘ द संजय स्टोरी ’में लिखा है कि मेनका ने साहसपूर्वक डेल्ही क्लास मिल्स यानी DCM के लिए तौलिया का एक बोल्ड अँड हॉट विज्ञापन किया। दिल्ली में विभिन्न स्थानों पर इसके होर्डिंग्स लगाए गए थे।

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28 जुलाई को इस विज्ञापन को संभालने वाली विज्ञापन एजेंसी को अचानक मिसेज आनंद यानी मेनका की मां का फोन आया कि मेनका के विज्ञापन के इन होर्डिंग्स को तुरंत हटा दिया जाए। उनकी बेटी की कई तस्वीरों और ट्रांसपेंसीज हों, वापस लौटाएं । रात भर में उन्होंने सारे होर्डिंग्स हटा दिये। यह माना जाता है कि विज्ञापन एजेंसी को बताया गया था कि पीएम हाउस यही चाहता है।

संजय से मुलाकात हुई और संजय मेनका का नज़दीकियाँ बढ्ने लगी

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फ्री-प्रेस जर्नल में सोनाली पिम्पुटकर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, “वास्तव में संजय उनके उस टॉवल के बोल्ड विज्ञापन को देखकर मोहित हो गए थे। संजय उन दिनों मेनका के कज़िन वीनू कपूर के दोस्त थे। वीनु की शादी के मौके पर संजय और मेनका एक कॉकटेल पार्टी में मुलाक़ात हुयी ।

संजय मेनका से पहली बार 1973 में मिले थे। तब मेनका 17 साल की थीं। उन्होंने एक साथ शाम बिताई। अगले दिन फिर मिलने का फैसला किया। वे अगले दिन मिले। निकटता बढ़ने लगी। संजय का उसी समय हर्निया का ऑपरेशन हुआ था। मेनका उसे देखने के लिए हर दिन अस्पताल जाती थी।

विनोद मेहता ने अपनी पुस्तक में उषा भगत का हवाला दिया, जिन्होंने उन दिनों प्रधान मंत्री निवास में काम किया था। उषा ने उन दिनों अपने एक दोस्त को लिखा, “संजय इन दिनों सिर से पाँव तक प्यार मे डूबा हुआ है।”

जब संजय गांधी ने मेनका का हाथ मांगा

“द संजय स्टोरी” में विनोद मेहता ने लिखा, “संजय ने दिवंगत कर्नल आनंद से बेटी का हाथ उन्हे सौपने का अनुरोध किया। कर्नल आनंद ने कहा कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उन्हें पहले अपनी मां से बात करनी चाहिए।”

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पुस्तक में कहा गया है, “जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने सुना कि उनका बेटा शादी करने के बारे में सोच रहा है, तो उन्होंने राहत की सांस ली। हालांकि उन्हें यकीन नहीं था कि मेनका उनके बेटे के लिए कितनी अच्छी होगी।” इंदिरा ने मेनका को बुलाया। उनसे गंभीरता से बात की, बातचीत में दो बिंदुओं पर जोर दिया, पहला, उनके बेटे के साथ रहना आसान नहीं है।

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दूसरी बात इंदिरा को और चिंतित कर रही थी कि संजय मेनका से दस साल बड़े हैं। मेनका ने छोटा जवाब दिया, वह दोनों को जानती है लेकिन उसे कोई समस्या नहीं है। आखिरकार प्यार की जीत हुई। “

सादगी से हुयी शादी

शादी 29 सितंबर 1974 को हुई थी। यह बहुत ही सादगी से हुयी। गांधी के पारिवारिक मित्र मोहम्मद यूनुस के घर को शादी के लिए चुना गया था। परिवार के करीबी लोगों को इसमें बुलाया गया । प्रेस और टीवी को दूर रखा गया। हालांकि, ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ पत्रिका ने इस शादी में एक कोण भी निकाला, ‘मेनका एक सिख है, संजय की माँ एक हिंदू है। पिता पारसी और एक मुस्लिम के घर से शादी कर रहे हैं – जो कि धर्मनिरपेक्ष विचार के लिए एकदम सही है। हनीमून पर जाने के बजाय मेनका अगले दिन अपनी जर्मन क्लास में चली गई और संजय अपनी कार की फैक्ट्री चला गये।

यह शादी अच्छी चली। हालांकि, कुछ लोगों ने अनुमान लगाया कि यह एक वर्ष से अधिक नहीं चलेगी। जब वर्ष 1980 में संजय की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई, तब दोनों का बेटा वरुण केवल तीन महीने का था। हालांकि, इस घटना के कुछ महीने बाद, मेनका और इंदिरा के बीच मतभेद की खबरें आने लगी ।

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खुशवंत सिंह ने अपनी पुस्तक ‘एब्सोल्यूट खुशवंत’ में लिखा है, “इंदिरा उनके साथ गांव की सासों की तरह व्यवहार करने लगीं।” एक साल बाद सास और बहू के रिश्ते में इतनी खटास आ गई कि मेनका ने प्रधानमंत्री आवास छोड़ दिया। उसके बाद उन्होंने अपनी जगह बनाई। इन दिनों वे एनडीए सरकार में मंत्री हैं और वरुण भाजपा सांसद हैं।

संजय का इमरजेंसी सर्किल और रुखसाना सुल्तान

आपातकाल के दौरान संजय काफी लोकप्रिय हुए। साथ ही उनके साथ रहने वाली मण्डली भी चर्चा मे रहने लगी। कई चर्चाएं थीं कि संजय का रुखसाना सुल्तान के साथ संबंध था यानी बेगम रुखसाना को उनका बायां हाथ कहा जाता था।

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रुखसाना खूबसूरत और मॉडर्न औरत थी। उन्हें कॉलेज में दिल्ली के प्रसिद्ध बिल्डर शोभा सिंह के परिवार के विक्रम सिंह से प्यार हो गया। फिर शादी हो गई। एक बेटी हुयी जो बॉलीवुड अभिनेत्री अमृता सिंह है। तलाक के बाद रुखसाना ने बुटीक चलाना शुरू कर दिया। उनका दिल्ली के हाई सरकिल में बैठना था।

संजय ने रुखसाना को तुरंत लोगों के बीच काम करने के लिए कहा

इंडिया टुडे ने 14 अगस्त 2014 के अंक में ‘द चीफ ग्लैमर गर्ल ऑफ द इमरजेंसी’ शीर्षक से एक लंबा लेख प्रकाशित किया। इसमें रुखसाना ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, ‘वह पहली बार संजय गांधी के पास आपातकाल में आईं और उनसे कहा कि मैं आपके साथ काम करना चाहती हूं। संजय ने तुरंत उन्हें पुरानी दिल्ली में लोगों के बीच जाने और काम करने के लिए कहा।

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बाद में कहा गया कि उन्होंने पुरानी दिल्ली में लगभग 13 हजार नसबंदी करवाई। हालाँकि रुखसाना काफी विवादित रही। वह लोगों के बीच यह दिखाने की कोशिश करती थी कि वह संजय के कितने करीब है। वरिष्ठ पत्रकार राजेश रपरिया कहते हैं, “संजय और रुखसाना के रिश्ते के बारे में और अधिक चर्चाएँ हो सकती हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि दोनों के बीच कुछ हुआ होगा।”

महिलाएं उनके करीब रहती हैं का आरोप

हालांकि संजय पर कई बार आरोप लगाया गया है कि महिलाएं उनके करीब रहती हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसी बातें खुलकर सामने आ जाती हैं। हालांकि, उस समय दिल्ली में धनी व्यापारी कुलदीप नारंग के साथ संजय की दोस्ती पर अलग-अलग टिप्पणियां थीं।

कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक “इमरजेंसी रिटेल” में कहा है कि संजय ने नारंग की अस्थिरता पर कई काम किए। वहीं, पत्रकार कुमी कपूर ने “आपातकाल: एक व्यक्तिगत इतिहास” पुस्तक में लिखा है कि कैसे आपातकाल के दौरान नारंग संजय गांधी के लिए सभी चीजों को सूँघते थे।

विनोद मेहता ने अपनी पुस्तक “द संजय स्टोरी” में एक इशारे में कहा है कि कैसे नारंग ने संजय की कमजोरी के लिए महिलाओं को चारे के रूप में इस्तेमाल किया। हालाँकि, मेहता ने इसे एक बिचौलिये के उद्धरण के रूप में भी कहा। यह भी लिखा गया था कि प्रधानमंत्री का बेटा होने के नाते, महिलाएं अलग-अलग मकसद से उनके साथ घूमती थीं।

जगोता भाइयों की कहानी

मेहता ने पुस्तक में जगोता बंधुओं का उल्लेख किया है। एक दिन देर रात में, जगोता भाइयों ने संजय से अपनी बहन के बारे में बात करने की कोशिश की। भाई चाहते थे कि संजय अपनी बहन के लिए कुछ सम्मानजनक काम करे। संजय ने मिलने से किया इंकार कर दिया ।

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पीएम हाउस की सुरक्षा से यह कहा गया था कि ये भाई किसी भी तरह से प्रवेश नहीं कर सके। जगोता भाई संजय से मिलने के लिए पीएम हाउस आने के लिए इतने उत्सुक थे कि उन्होंने एक, सफदरजंग हाउस के गेट से ट्टकरमार कार से घुसने की कोशिश की। दोनों भाइयों को तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। बाद में संजय कैंप ने कहा, ये भाई एक लड़की को पीएम हाउस में घुसाने की कोशिश कर रहे थे।

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चौंकाने वाली मौत

23 जून 1980 का दिन चौंकाने वाली खबर लेकर आया। खबर थी कि संजय गांधी विमान की उड़ान भरते समय दुर्घटना में मारे गए। उनके बारे में कहा जाता है कि वह कार की तरह विमान चलाते थे। उन्हें कलाबाजी में उड़ान भरने का शौक था। 1976 में, उन्हें हल्के विमान उड़ाने का लाइसेंस मिला, जिसे इंदिरा गांधी के सत्ता से बाहर होते ही जनता सरकार से छीन लिया था।

इंदिरा गांधी के सत्ता में लौटते ही उन्हें यह लाइसेंस वापस मिल गया। मई 1980 में, दो सीटों वाले विमान ‘पिट्स एस 2 ए’ को भारत में आयात के लिए मंजूरी दी गई थी। जल्दी ही, विमान सफदरजंग हवाई अड्डे पर दिल्ली फ्लाइंग क्लब में भी पहुंचा।

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संजय ने पहली बार 21 जून 1980 को नए विमान में अपना हाथ आजमाया। दूसरे दिन यानी 22 जून को पत्नी मेनका गांधी, इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आरके धवन और धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के साथ उड़ान भरी। विमान 40 मिनट तक दिल्ली के आसमान पर उड़ता रहा। 23 जून को, वह फिर से विमान उड़ाने पहुंचे। वह प्रशिक्षक सुभाष सक्सेना के साथ बैठे।

उन्होंने ठीक 58 मिनट पर उड़ान भरी। सुरक्षा नियमों को दरकिनार कर आवासीय क्षेत्र में तीन लूप लगगए । चौथा लूप लगाने वाले थे की तभी विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया। पिट्स सीधा नाक के बल जमीन की तरफ गिर पड़ा 2 सीटर पिट्स धातु में बदल गया। उसमें से गहरा काला धुआँ निकल रहा था। किसी तरह दोनों के शव विमान के मलबे से निकाले गए। तुरंत एक एम्बुलेंस उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले गई, जहाँ दोनों को मृत घोषित कर दिया गया।

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